हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार और चित्रकार रामकुमार क्या आध्यात्मिक चित्रकार थे ? आमतौर पर उन्हें उनके अद्भुत लैंडस्केप और अमूर्तन चित्रों के लिए जाना जाता है लेकिन क्या उनकी चित्रकला में एक तरह की आध्यात्मिकता भी छिपी हुई थी?
विमल कुमार
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कल शाम जब उनपर बनी एक फ़िल्म दिखाई तो उसे देखने के बाद मन में सहसा यह सवाल उठा क्योंकि उस फिल्म के अंत में रामकुमार अपनी चित्रकला के बारे में बताते हुए खुद यह कहते हैं कि उनकी चित्रकला में भारतीयता और आध्यात्मिकता का पुट है। वह यह भी कहते हैं कि यह आध्यात्मिकता कोई बाहर से नहीं आती है बल्कि वह व्यक्ति के भीतर ही होती है। उनके लिए कला भी भीतर से ही प्रस्फुटित होती है और उनके भीतर जो भारतीयता है, वह भी उनके भीतर की ही निर्मिति है।
रामकुमार के चित्रों को जिन लोगों ने देखा होगा उन्हें बनारस को लेकर बनाए गए उनके अद्भुत चित्र अक्सर याद आते हैं ।इतना ही नहीं शिमला में उनके गुजरे बचपन में दर्ज पर्वतों की स्मृतियां भी उनके चित्रों में बोलती रहती हैं । रामकुमार प्रख्यात लेखक निर्मल वर्मा के बड़े भाई रहे हैं। दोनों की कृतियों में पर्वत बोलते हैं पर मौन की भाषा में।
रामकुमार के निधन के करीब सात वर्षों बाद राजधानी में उनके प्रशंसकों ने इस फिल्म के माध्यम से उन्हें एक बार फिर याद किया। यह फिल्म ललित कला अकादमी द्वारा तब बनाई गई थी जब प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी और लेखक अशोक वाजपेयी उसके अध्यक्ष थे।
श्री वाजपयी ने फिल्म के प्रारंभ में अपने वक्तव्य में बताया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में चार चित्रकारों पर फिल्में बनाई थीं और तब इस पर ₹500000 खर्च हुए थे। इस फिल्म में रामकुमार को पेंट करते हुए दिखाया गया है और बीच बीच में उन्हें अपने बारे में बहुत कुछ बताते हुए भी दिखाया गया है। बीच-बीच में उनके पेरिस प्रवास का भी जिक्र भी किया गया है और यशोधरा डालमिया एवम कुछ अन्य लोगों द्वारा उनके काम के बारे में टिप्पणी भी दिखाई गई है।
56 मिनट की यह फिल्म रामकुमार को और उनकी कला को समझने का एक सूत्र प्रदान करती हैं। 23 सितंबर 1924 को शिमला में जन्मे रामकुमार की इस वर्ष जन्मशती पूरी हुई हैं और अब उनके 101 वर्ष पूरे हो गए।
रामकुमार आजादी के बाद भारत के उन यशस्वी चित्रकारों में से एक हैं जो न केवल प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप से जुड़े रहे बल्कि उनकी ख्याति एक अंतरराष्ट्रीय चित्रकार की रही है ।यह भी एक सहयोग कि रामकुमार रजा से दिल्ली में एक प्रदर्शनी में मिले थे और तब से उनकी मित्रता रही। जब रजा मुंबई में कल्याण में रहते थे तो उन दिनों भी रामकुमार वहां मुंबई में रहते थे।
रामकुमार फ्रांस जाने वाले पहले भारतीय चित्रकार थे । उसके बाद तो रजा साहब और अकबर पदमसी भी वहां गए । फ़िल्म में रामकुमार बताते हैं कि वे किस तरह फ्रांस गये और उस जमाने में उन्होंने 750 रुपए में विमान का टिकट लिया था लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह उनकी पढ़ाई का खर्च वहन कर सके तो उन्हें सरकार से प्रतिमाह ₹100 का एक वर्ष तक वजीफा मिल गया था और इस तरह रामकुमार ने फ्रांस में अपनी शिक्षा दीक्षा प्राप्त की।
एक जमाना था जब रामकुमार के चित्र हजार- ₹2000 में बिकते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ती गई और बाद में लाखों और करोड़ों में उनकी पेंटिंग्स बिकने लगी. उनके पुत्र ने बताया कि रामकुमार की पेंटिंग भले ही अपने समय में एक -₹2000 में बिकी थी लेकिन उन्हें कभी आर्थिक दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि उनकी पेंटिंग अक्सर बिका करती थी । मुंबई के अमीर लोग और उद्योगपति उनकी पेंटिंग खरीदने अक्सर आया करते थे क्योंकि उनकी पेंटिंग में किसी तरह की कोई हिंसा या आक्रमकता या प्रदर्शन नहीं होता था।जो इंग्लैंड के आर्ट विक्रेताओं ने भारतीय चित्रकारों की पेंटिंग नीलाम करनी शुरू की तो भारतीय कलाकार भी करोड़पति हो गए।
रामकुमार की पेंटिंग एक शांत किस्म की निर्विकार पेंटिंग होती थी जिसमें एक तरह की गहराई होती थी और एक गहरा सुकून भी। उनकी पेंटिंग को देखकर कला प्रेमी उनसे एक तत्काल तादात्म्य स्थापित कर लेते थे बल्कि उसे आत्मसात भी कर लेते थे, भले ही उनकी कलाकृतियां आकृति मूलक नहीं थी बल्कि वह अमूर्तन लिए हुए थी। कई बार अमूर्तन चित्र को लेकर सामान्य दर्शक और कला प्रेमी एक तरह की उलझन में पड़ जाते हैं, लेकिन रामकुमार की पेंटिंग का अमूर्तन दर्शकों को बार बार खींचता था। क्योंकि उस पेंटिंग में एक तरह की मानवीय और प्राकृतिक सचाई तथा गहरी संवेदना व्यक्त होती थी। उनकी पेंटिंग में व्यक्त प्रकृति भी बहुत ही सृजनात्मक नजर आती थी चाहे बनारस के घाट हो या पहाड़ी इलाकों के मकान या हिमालय पर्वत।
ये सब उनके यहां बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत होते थे और उसका सौंदर्य कुछ इस तरह होता था कि लोग उसे अपनी सूक्ष्म भावनाओं से जोड़ लेते थे। रामकुमार का मुहावरा बिल्कुल अलग था बल्कि भारतीय चित्रकला का एक नवाचारी मुहावरा था जिसकी परम्परा पहले नहीं मिलती।इस फिल्म में भी बीच-बीच में उनकी पेंटिंग दिखाई गई है और उनके जीवन के विभिन्न कालों को भी प्रदर्शित किया गया है ।रामकुमार निर्मल जी दोनों अपने आरंभिक काल में कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे।पेरिस में भी वे कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर गए थे और वहां के लेखकों से मिले थे।
अशोक जी ने बताया कि ललित कला अकेडमी में अध्यक्ष होते रहते हुए उन्होंने रामकुमार के अलावा अकबर पदमसी रजा और हुसैन पर भी फिल्में बनवाई थी । बहरहाल रामकुमार पर बनी इस फिल्म को देखना एक नए कलात्मक अनुभव से गुजरना था। उनकी पेंटिंग संगीत की तरह है।फ़िल्म के पार्श्व में जब संगीत की स्वर लहरियाँ गूंजती हैं तो उनके चित्र खिल उठते हैं। राम कुमार को इस फ़िल्म के जरिये भी देखा समझा और विश्लेषित किया जा सकता है। रामकुमार नहीं हैं अब पर उनके चित्र तो हैं उनमें रामकुमार जिंदा हैं।